शिक्षाकर्मी संविलियन ....... चुनावी वादों का सफर न जाने कब मंजिल तक पहुँचेगा


रायपुर। छत्तीसगढ़ में शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो ,अन्य राज्यों की अपेक्षा संतोषप्रद है। प्रति वर्ष हाईस्कूल, हायर सेकेंडरी स्कूलों के परीक्षा परिणाम को देखकर हमेशा शिक्षकों की तारीफ़ की जाती है। वार्षिक परीक्षा परिणाम 2019 की बात करें तो ,पुरे छत्तीसगढ़ में कुछ जिलों को छोड़कर बाकि सभी जिलों का परीक्षा परिणाम  बहुत ही अच्छा रहा है। शिक्षकों ने बताया कि कई सरकारी स्कूल ऐसे हैं जहाँ का रिजल्ट 99 % तक आया है। 


पर इन बच्चों को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाने वाले शिक्षक हमेशा ही उपेक्षा का शिकार होते आये हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन से पहले ही शिक्षाकर्मी का जन्म हो गया था, उस समय शिक्षाकर्मियों की स्थिति और भी दयनीय थी । छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद शिक्षाकर्मियों में संविलियन की आस जगी ,परन्तु वह भी पूरा नहीं हो सका। हालांकि कुछ सुविधाओं में वृद्धि जरूर हुआ है। 

छत्तीसगढ़ में अब भी 48000 शिक्षाकर्मी सरकार के वादे के मुताबिक संविलियन की आस लगाए हैं ।

छत्तीसगढ़ में शिक्षकों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य अब तक का ये रहा है कि जो भी राजनितिक दल अपनी चुनावी घोषणा पत्र में संविलियन की बात करता है ,सत्ता में आते ही अपने चुनावी वादे को भूल जाती है। यह सिलसिला राज्य  गठन के समय से चली आ रही है। सरकार बनती है कार्यकाल पूरा करती है ,फिर चुनाव आता है ,पार्टियाँ संविलियन की बात करती है और सत्ता में आते ही भूल जाती है।

 जब हमने कुछ शिक्षकों से उनके समस्याओं के बारे जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि समस्याएँ तो बहुत सारी है, पर सभी छोटी-छोटी समस्याएँ है। संविलियन के अलावा शिक्षकों की एक और बहुत बड़ी समस्या है जिसका समाधान आज तक नहीं किया जा सका है ,समय पर वेतन का न मिलना। सभी इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि शिक्षक अपने गॉव घर से दूर रह कर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं और तीन से चार माह तक वेतन नहीं मिलता है । किराये का माकन ,बच्चों की स्कूल फीस ,दैनिक निर्वाह की वस्तुओं की पूर्ति कैसे की जाती है , एक शिक्षाकर्मी ही समझ सकता है।  


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