शिक्षक संगठनों (lb ) के बीच खुलकर समाने आया मनमुटाव एक दूसरे पर लगा रहे आरोप -प्रत्यारोप,,,,,,,आम शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है खामियाजा,,,,,



एकता में ही शक्ति होती है यह कहावत तो आपने सुना ही होगा ,यदि एकता है तो बड़ा से बड़ा लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है ,परन्तु शिक्षक संघ शायद इस बात को भूल चुके हैं ,तभी तो आपस में मिलकर लक्ष्य के दिशा में कार्य करने के बजाय वर्चस्व की लड़ाई में उलझे हुए हैं। 


संविदा से लेकर शिक्षाकर्मी फिर शिक्षक पंचायत ,स्थानांतरण न जाने कितना संघर्ष करना पड़ा है तब जाकर शिक्षक एलबी संवर्ग का दर्जा मिला है ,परन्तु अब भी शिक्षकों के समस्याओं पर फुलस्टॉप नहीं लग पाया है।  शिक्षक कई सालों से पदोन्नति /क्रमोन्नति मिलने का राह तक रहे हैं ,शासन से निराश शिक्षक अपने संघ की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं ,परन्तु संघों के बीच कुछ और ही चल रहा है।   

शिक्षक संगठनों के बीच चल रहे वर्चस्व की लड़ाई को देखते हुए लगता है ,इस बार भी आम शिक्षकों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा ,क्योंकि वर्चस्व की लड़ाई में उलझे शिक्षक संघ आम शिक्षकों के हित को ध्यान देने के बजाय अपने संघ को दूसरे संघ से ज्यादा प्रभावी और जनाधार वाला बताने में लगे हुए हैं। 


विभिन्न शिक्षक संगठनों के क्रिया-कलापों को देखते हुए धीरे -धीरे आम शिक्षकों को समझ में आने लगा है ,शायद यही कारण है कि किसी संघ के सभा -सम्मेलनों में अब उतना भीड़ देखने को नहीं मिलता ,जितना पहले हुआ करता था। 


संघ के आपसी मनमुटाव का खामियाजा भुगत रहे आम शिक्षक -

किसी भी संघर्ष में संख्या बल बहुत मायने रखता है ,शिक्षक संघ कभी भी एक बैनर तले आना नहीं चाहते और अपने मन मुताबिक अलग -अलग समय में मांग हेतु कार्यक्रम निर्धारित करते रहते हैं जिससे शिक्षकों की संख्या बंट जाता है और मांग प्रभावी नहीं बन पाता। शासन यदि मांग पर ध्यान देता भी है तो संख्या बल को देखते हुए अपने इच्छा अनुसार जो देना रहता है दे देता है। 

विभिन्न शिक्षक संघ इस बात को भलीभांति समझते हैं ,परन्तु अपने स्वार्थ और वर्चस्व के झूठे अहंकार में शिक्षकों के मांग को कुचलने में पीछे नहीं हटते। आम शिक्षकों की मानें तो शिक्षकों का स्कूल शिक्षा विभाग में संविलियन बहुत पहले ही हो गया रहता ,परन्तु संघों के आपसी खींचतान के कारण ही संविलियन देर से मिला है। 

श्रेय लेने की लगी रहती है होड़ -

इस मामले में तो शिक्षक संघ राजनितिक दल को भी पीछे छोड़ चुके हैं ,यदि शासन द्वारा शिक्षकों हित के संबंध में कोई आदेश जारी होता है ,शिक्षक संघों में श्रेय लेने की होड़ लग जाता है। हर एक संघ उसे अपने संघ के प्रयास का नतीजा बताने लगता है।  

आम शिक्षक भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आखिर कौन से संघ के बातों पर विश्वास करे। 

 एक ब्लॉक में दो से तीन संघ-

यदि हम ब्लॉक स्तर की बात करें तो प्रत्येक ब्लॉक में दो से तीन संघ है। अधिकारी भी कन्फ्यूज हो जाते होंगे कि किस संघ ने क्या ज्ञापन दिया है ,क्योंकि एक संघ उसी मांग को लेकर आज ज्ञापन देता है तो दुसरा संघ उसी मांग के संबंध में दूसरे दिन अधिकारी से मुलाकात करता है। 

कभी -कभी तो पढ़े लिखे आम लोग सलाह भी दे देते हैं कि जब मांग एक है तो फिर ज्ञापन अलग -अलग क्यों ? 

संघ ने शिक्षकों को बाटंने का किया है काम -

शिक्षक देश का कर्णधार होता है। शिक्षक देश के लिए एक अच्छा नागरिक तैयार करने के साथ -साथ देश के एकता अखंडता को बनाये रखने तथा राष्ट्रीयता की भावना का विकास करने में अहम भूमिका निभाता है ,परन्तु प्रदेश के शिक्षकों की बात करें तो वे खुद ही कई भागों में बँटे हुए हैं। 

कई ब्लॉकों में तो शिक्षक संघों के बीच आम शिक्षक चक्की की तरह घूम रहे हैं ,यदि किसी के मांग /ज्ञापन में उपस्थित नहीं हुए तो उसे दूसरे संघ का मान लिया जाता है। स्कूलों में स्टॉफ भी दो से तीन संघों में बँट चूके हैं ,जिससे स्टॉफ का माहौल तनावयुक्त हो चूका है। जिसका सीधा असर शिक्षा पर पड़ता है।  

बुलबुले की तरह बन रहे हैं शिक्षक संघ -

आम शिक्षकों के मुताबिक -चाहे कारण जो भी पर शिक्षक संघ आपस में मर्ज होने के बजाय और नए-नए संघ बनते जा रहे हैं जो उनकी मांग में सबसे बड़ी बाधा है। 

आम शिक्षकों का संघ से उठ चुका है विशवास -

संघों के क्रियाकलापों को देखते हुए आम शिक्षकों का संघ के प्रति लगाव कम होता जा रहा है। शिक्षक संघ भी इस बात को भलीभांति जान चुके हैं ,शायद यही कारण है कि संघ की शक्ति को शिक्षकों के हित में लगाने के बजाय दूसरे संघ को कमजोर बताकर आम शिक्षकों को अपनी ओर आकर्षित करने में लगा रहे हैं। 

आम शिक्षकों को अब धीरे -धीरे पूरा माजरा समझ में आ रहा है ,इस लिए ज्यादातर शिक्षक संघों से दुरी बना लिए हैं और किसी भी संघ के किसी प्रकार के आयोजनों में शामिल नहीं हो रहे हैं ,क्योंकि यदि किसी संघ के साथ दिखे तो दूसरा संघ उसे अपना विरोधी मानने लगता है। 


विभिन्न संगठनों के क्रमोन्नति /पदोन्नति का मांग दिखावा तो नहीं है -

जब हर एक संघ जानता है कि क्रमोन्नति /पदोन्नति मिलना आसान नहीं है ,इसके लिए हो सकता है आंदोलन भी करना पड़े ,फिर क्यों किसी को बड़ा और छोटा साबित करने में लगे हैं ,क्यों सभी संघ एक ही बैनरतले आना नहीं चाहते ,इससे स्पष्ट है संघों के क्रमोन्नति /पदोन्नति मांग करने का दिखाया किया जा रहा है। 

यदि मांग एक है तो एक साथ मिलकर  क्रमोन्नति /पदोन्नति का मांग क्यों नहीं रखा जा सकता। 

संघों के एकता का मिल चूका है जबरदस्त लाभ -

आज भी आम शिक्षकों को उम्मीद है कि सभी संघ कभी न कभी एक ही बैनर तले आकर सरकार से अपनी बात रखेंगे ,क्योंकि शिक्षक संवर्ग का स्कूल शिक्षा विभाग में जो संविलियन किया गया है वह 2012 में सभी संघों का एक बैनरतले आकर किये गए संघर्षों का ही नतीजा है। 

संघों के वर्चस्व की लड़ाई से व्यथित एक शिक्षक के कलम से यह रिपोर्ट शिक्षक एलबी न्यूज़ द्वारा तैयार किया गया है । 

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